आयुर्वेद स्वस्थवृत्तचर्या में व्यायाम का बहुत ही महत्व है, आयुर्वेद के अग्रय द्रव्यों में से एक है व्यायाम।
“जिस कार्य को करने से शरीर में थकावट उत्पन्न हो, उसको व्यायाम कहते हैं।”
“शरीर की ऐसी चेष्टा जिसके कारण शरीर में स्थिरता आए और बल की वृद्धि हो, वो है व्यायाम।”
व्यायाम करने की पहचान
हम ऐसा शारीरिक परिश्रम करें जिसमें हृदय की वायु अगर मुख तक आ जाए, और मुख सुखने लगे, फिर समझें कि मैंने व्यायाम कर लिया है।
आयुर्वेद ग्रंथों में बलार्ध शक्ति कार्य को व्यायाम कहा गया है, बलार्ध शक्ति का मतलब यह है कि हम ऐसा कार्य करें जिसके करने से:
- कक्षा (Axila)
- नासा (Nose)
- ललाट (Forehead)
- गात्र संधि (Body Joints)
उपरोक्त ४ जगह से पसीना आने लगे फिर समझें कि हमने बलार्ध कार्य अर्थात व्यायाम कर लिया है।
सम्यक व्यायाम के लक्षण
- पसीना आना
- सांस का बढ़ना
- शरीर में हल्कापन
- हृदय की गति तीव्र होना
उपरोक्त लक्षण मिलने पर व्यायाम बंद कर देना चाहिए।
व्यायाम करने से लाभ
आयुर्वेद में स्थौल्य यानि मोटापा को दूर करने के लिए व्यायाम से श्रेष्ठ कोई कार्य नहीं बताया गया है।
शरीर में हल्कापन, उदर की अग्नि बढ़ना, दुःख को सहन करने की क्षमता बढ़नी, कार्य करने की शक्ति बढ़नी, दोषों का कम होना, आलस्य दूर होना, अहितकर आहार सेवन करने से होने वाली व्याधि को दूर करना, बुढ़ापा देर से आना इत्यादि लाभ होते हैं।
बलवान व्यक्ति और स्निग्ध भोजन करने वाले लोगों को व्यायाम हमेशा पथ्य होता है।
अधिक व्यायाम से हानि
अधिक व्यायाम करने से ज्वर (बुखार), प्यास से पीड़ित होना, थकावट होना, कास, श्वास क्षय इत्यादि रोग होते हैं।
किसको व्यायाम नहीं करना चाहिए
- वात पित का रोगी हो
- बालक
- वृद्ध
- अजीर्ण (Indigestion) का रोगी हो

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