“रसनार्थो रसस तस्य”

अर्थात् जो हमारी रसना, यानी जीभ (tongue) का विषय हो, उसे रस कहा जाता है।
जिसे हम अपनी जीभ के द्वारा पहचानते हैं कि अमुक द्रव्य का अमुक स्वाद है, वही रस कहलाता है।

रस की उत्पत्ति में मुख्यतः जल और पृथ्वी महाभूत कारण होते हैं, और रस के विशेष ज्ञान के लिए आकाश, वायु, और अग्नि महाभूत सहायक होते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार कुल ६ प्रकार के रस होते हैं:

  1. मधुर (Sweet) – जैसे चीनी
  2. अम्ल (Sour) – जैसे नींबू
  3. लवण (Salt) – जैसे नमक
  4. तिक्त (Pungent) – जैसे नीम
  5. कटु (Bitter) – जैसे मिर्च
  6. कषाय (Astringent) – जैसे आंवला

इन ६ रसों में सबसे बलवान रस मधुर है, और सबसे दुर्बल रस कषाय है।

रसों के ज्ञान के साधन


  • सामान्य ज्ञान का साधन: प्रत्यक्ष प्रमाण — जैसे ही जीभ पर कोई पदार्थ छूता है और पहला स्वाद आता है, वह उसका सामान्य ज्ञान होता है।
  • विशेष ज्ञान का साधन: अनुमान प्रमाण — जैसे कुछ खाने के बाद स्वाद में बदलाव महसूस होता है; जैसे आंवला खाने पर पहले कसैला और फिर मधुर स्वाद आता है।
  • प्रायोगिक ज्ञान का साधन: आप्त उपदेश प्रमाण — अर्थात किस रस का प्रयोग किस रोग में, कब और कैसे करना चाहिए।

रसों का रोगानुसार प्रयोग क्रम


  • वातज रोग: सबसे पहले लवण रस, फिर अम्ल रस, और अंत में मधुर रस का प्रयोग करना चाहिए।
  • पित्तज रोग: सबसे पहले तिक्त रस, फिर मधुर रस, और अंत में कषाय रस का प्रयोग करना चाहिए।
  • कफज रोग: सबसे पहले कटु रस, फिर तिक्त रस, और अंत में कषाय रस का प्रयोग करना चाहिए।

Leave a comment

Recent Videos

“Dr. Sameer’s insights on Ayurveda have transformed my approach to health and wellness. His guidance has truly made a positive impact on my life!”

~ Vishal Gupta

Copyright © 2024 AyurvedicWays. All Rights Reserved.